‘अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है!’ वामिक जौनपुरी

सिराज-ए-हिंद सदियों से प्रतिभा की खान रही है, इस कड़ी में आज पेश करता हूँ वामिक जौनपुरी साहेब का लिखा ये नज्म! अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है ये कम कि आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार बाक़ी है अभी तो शहर के खंडरों में झाँकना है मुझे ये देखना भी तो है कोई यार बाक़ी है अभी तो काँटों...