Friday, December 14, 2018
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Apki Kahani Meri Jubani: Nisha Ki naina| Kahaniya In Hindi

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Apki Kahani Meri Jubani: Nisha Kinaina| Kahaniya In Hindi

Nisha Ki Naina भाग १ Kahaniya In Hindi

पेश ए खिदमत है निशा की नैना का दूसरा भाग:

प्रॉपर पटोला में वही मल्लिका ऑटो से गुजरीमेरा दिल बाग़ बाग़ हो गया प्रॉपर पटोला तो समझते है ना आप लोगअरे भाई ‘ गाना सुनिएप्रॉपर पटोला‘ समझ आ जायेगा |
मैं झटके से उठा और ऑटो को देखने लगा| ऑटो कॉलेज के गेट के पास रुकी| करीब 2 मिनट तक ऑटो रुका था और मेरी नज़रें वहीं थमी हुयी थी| ऑटो तो आगे निकल गया और सुनैना भी | 
“चलो दोस्तों चलते है फिर..” मैंने कहा|
“क्या? अभी 15 मिनट है क्या हो गया? लगता है पटोला क़त्ल कर गयी है|” और चाय का ठेका ठहाकों से गूँज उठा| मैं भी मुस्काये बिन ना रह सका|
किसी तरह 5 मिनट और बिताये और सभी एंट्री गेट पर आ गये | सभी लिस्ट में अपना रूम ढूढने में व्यस्त थे और मैं सुनैना का| बी-18 और मेरा ए-6 | साला यहाँ भी लग गये|
“चलो यार अपना तो हर जगह कट ही जाता है! मिलते है ३ घंटे बाद” और सब अपने अपने रूम की तरफ बढ़ गये|

 

 

Best Books To Read in Hindi December 2018

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सर्द हवाओं ने दस्तक दे दी है, गर्म कपड़े , रजाई, कम्बल सब निकल गए हैं | तो कम्बल में चाय की चुस्कियों के साथ किताबें हो तो क्या बात है तो फटाफट चेकलिस्ट कीजिये Best Books To Read in Hindi Decemeber 2018 :

Best Books To Read in Hindi December 2018

1. Best Books To Read लिस्ट में पहला नाम आता है: दिव्य प्रकाश दूबे जी की किताबों का | मसाला चाय, मुसाफिर कैफ़े से नयी वाली हिंदी (#naiwalihindi) को युवाओं से जोड़ने वाले दिव्य स्टोरीबाज़ी के लिए भी जाने जाते हैं| मसाला चाय का हाल में अंग्रेजी संस्करण भी आया है और अमेज़न पर खूब बिक रहा है | मुसाफिर कैफ़े जहा आपको उत्तराखंड की खूबसूरती से बांधे रखेगा तो मसाला चाय आपकी चुस्कियों का स्वाद और भी मज़ेदार कर देगी|  

2. सत्य व्यास: नयी वाली हिंदी के सूत्रधार में सत्य व्यास का भी नाम आता है बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, यानी बीएचयू से लॉ की पढ़ाई करने और वहां के भगवानदास होस्टल के किस्से को बनारस टाकीज़ में पिरोने वाले लेखक हिंदी पढ़ने वालों को नया फ़्लेवर देने में कामयाब रहे | इनकी दिल्ली दरबार भी लोगो को खूब पसंद आयी|

3. Best Books To Read लिस्ट में  अगला नाम है निखिल सचान का! नमक स्वादानुसार, ज़िंदगी आइस पाइस और यू पी 65 से अपनी अलग पहचान बनाने वाले निखिल बहुत कम समय में हिंदी लेखकों की सूची में आगे बढ़ रहे हैं |
4 . नीलेश मिश्रा: बात बे बात अपनी बात कहता है… रेडियो पर ये आवाज़ सुनते ही, घर के सारे काम बंद कर कहानी में खो जाते थे याद शहर की कहानियों का कलेक्शन इस ठण्ड में आपको सुखद एहसास दिलाएगी | याद शहर vol 1 & 2 को जरूर पढ़िए|

Buy Now: याद शहर vol 1 and 2 

5. संदीप देव की कहानी कम्यूनिस्टों की  Best Books To Read की लिस्ट में इस किताब को रखना इसलिए भी जरुरी है क्योकि ये जानना जरुरी है लेफ्ट और राइट क्या है? दोनों विचारधारा में इतनी असमानताएं क्यों है?

Buy Now: कहानी कम्यूनिस्टों की 

 कुछ और किताबें भी हैं जो आप चुन सकते हैं: ज़िंदगी ५०-50, इश्कियापा, नीला स्कार्फ,

अगर आपको मेरी Best Books To Read लिस्ट पसंद आयी तो दोस्तों के बीच शेयर कीजिये और हमें बताइये आपकी विश लिस्ट में क्या है?

आज़ादी के आयाम: एक नज़र १९४७ से २०१८ तक

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आज़ाद भारत के आयाम

आज़ादी के 72 साल, 15 अगस्त 1947 से 2018 का सफ़र नये कीर्तिमान, नये आयाम और बुलंदियों को छूता भारत! कितना गौरवमयी है ना! भारत 72 वर्षों में एक विश्वशक्ति बनकर उभरा है| शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सेवा, तकनीकी विज्ञान के क्षेत्र में हमने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है| मुकेश अम्बानी, रतन टाटा, अजीम प्रेम जी जैसे पूजीपतियों ने विश्व पटल पर भारत को पहचान दी है तो भारत के इंजिनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक विश्व में नाम कमा रहे हैं|
independence day amit pandey blog

आइये 1947 से 2018 तक के भारत के सफ़र पर नज़र डालते हैं-
दशकों संघर्ष के बाद आख़िरकार अंग्रेज देश छोड़ने को तैयार हुए, हाँ जाते जाते एक दंश दे गए, बंटवारा! हालाँकि राजनीतिज्ञ आज भी कतराते हैं बंटवारे के साजिशकर्ता का नाम लेते हुए| बटवारा इतनी धूर्तता से हुआ था की कारखाना एक देश के पास तो कच्चा माल दूसरे के पास, नदी का उद्गम एक देश में तो बाँध दूसरे में| एक देश जो धर्म विशेष बना तो दूसरा सर्व धर्म समभाव भावना से प्रेरित रहा हालाँकि यहाँ ये भी आशय रहा रहा होगा की आज नहीं तो कल दूसरा देश साम्प्रदाय की आग में झुलसेगा! क्योकि किसी विशेष संप्रदाय की बहुलता हमेशा से दूसरे के लिए संकट होता है जैसा पाकिस्तान में देखते आये हैं और भारत में भी कुछ राज्यों में ये कहानी दोहराई गयी है|
लेकिन इससे बड़ा सवाल ये है कि बटवारे से नुकसान किसका हुआ?
राजनेताओ का? पूजीपतियों का? तथाकथित महान देशभक्तों का? राजघरानो का?
मेरे हिसाब से नुकसान हुआ तो सिर्फ आम नागरिकों का, जिसने लहू भी बहाया और फिर जमीन भी गवाई| 55 लाख मुस्लिम भारत में ही रहना चुना जिनकी देशभक्ति पर आज भी सवाल उठते हैं| दशकों बाद भी धर्म के नाम पर खेला गया आज भी हो रहा है|
freedom amit pandey

कश्मीर नाम तो सुना होगा! महाराजा हरी सिंह और फिर शेख अब्दुल्ला के कश्मीर का जिन्न आज भी भारत और पडोसी मुल्क के रार का मुद्दा है|
लोकतंत्र की स्थापना के बाद कांग्रेस को 70% जनता ने सर्वसम्मति से चुना, वही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी में भी “रसूख” का असर दिखा जो आज भी राजनीती के गलियारे में परिवारवाद के नाम से जाना जाता है|   
पंडित नेहरू और फिर शास्त्री जी की ताशकंद में हुयी संदिग्ध मौत से कांग्रेस को बहुत नुकसान हुआ और विपक्षी पार्टियाँ मजबूत हुयी|
वहीं अपनी जमीन, जमीर के लिए आन्ध्र प्रदेश और दूसरे हिस्से में एक गुट उभरा, जिसे “नक्सल” के नाम से जानते हैं|
आज़ादी के २५ सालों बाद भी देश बेरोज़गारी, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य की बुनियादी जरुरत के लिए भी संघर्ष कर रहा था| देश में असंतोष था जिसका फायदा विपक्ष ने उठाया और यही से शुरू हुआ “फरेब” और “झूठे वादे” का राजनीतिक हथकंडा| जय प्रकाश के देश व्यापी आन्दोलन और कांग्रेस का विरोध देश को आपातकाल की भट्टी में झुलसने को मजबूर किया| हालाँकि “जनता पार्टी” को फायदा हुआ, आपातकाल के बाद सत्ता में आये लेकिन उसके बाद देश में दंगे की आग भड़की और “जनता पार्टी” सत्ता से बेदखल हो गयी|
उसके बाद पंजाब में खालिस्तान की मांग उठने लगी, जो आगे चलकर इंदिरा गाँधी की हत्या के रूप खत्म हुयी | सिख दंगा हुआ, हजारों के खून बहे, लाशे बिछी |

वही श्रीलंका के साथ अच्छे सम्बन्ध की कीमत राजीव गाँधी को मौत के रूप में चुकानी पड़ी | संजय, इंदिरा और फिर राजीव के बाद कांग्रेस का दौर खत्म होता प्रतीत हुआ | विपक्ष हावी हुआ |
१९९० से भारत में सूचना और संचार ने कुचालें भरना शुरू की और आज जिओ डिजिटल भारत के मिशन को आगे ले जा रहा है|
इसी दौरान जातिगत आरक्षण को सर्वसम्मति से अनिवार्य और मूलभूत सेवाओ में शामिल कर लिया गया| 1998 में पोखरण परीक्षण हुआ जो देश के लिए मील का पत्थर साबित हुआ हालाँकि वैश्विक प्रतिबन्ध भी झेलना पड़ा लेकिन वो सफलता के पैमाना पर कमतर था| भारत दूसरे देशों के लिए चुनौती भी बन कर उभरा| मुंबई बम ब्लास्ट और फिर बाबरी मस्जिद विन्ध्वंश ने देश को झकझोर कर रख दिया|

हम चुनौतियों से लड़ते हुए आगे तो बढ़ते गए लेकिन 2000 से देश में राजनीतिक पतन का दौर शुरू हुआ| कांग्रेस परिवारवाद को तोड़कर वित्तीय मामलों के महारथी को सत्ता देती है लेकिन एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल करती है जिसका फायदा “गोधरा” से लोगों की नज़र में आये “नरेन्द्र मोदी” को हुआ| हाँ, मोदी ने गुजरात की कायाकल्प की तो देश को एक आश दिखी और २०१४ के ऐतिहासिक फैसले ने जनता ने सदी के दूसरे शक्तिशाली व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में चुना|
मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल का अंतिम वर्ष है| २०१४ में लाल किले के प्राचीर से इतने वादे हुए थे की कुछ एक ही याद हैं बाकि जुमलों में बदल गए| बेशक बेरोज़गारी, स्वास्थ्य, गरीबी, शिक्षा में सुधार की कोशिस हुयी है लेकिन उससे ज्यादा नुकसान हुआ है सम्प्रदियक सौहार्द का| आशा करता हूँ आने वाले समय में सौहार्द को बनाये रखने की प्राथमिकता होगी|
माफ़ कीजियेगा विस्तृत अवलोकन पेश नहीं क़र पाया, लेकिन अगला पोस्ट “आज़ादी और मेरे ख्याल” जरुर  पढियेगा|

जय हिंद

मुसाफिर कैफ़े : सपनों की उड़ान है दिव्य प्रकाश दूबे की किताब

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मुसाफिर कैफ़े नाम से ही लगता है, कि खानाबदोशों के लिए ही बनाया होगा|
 लेकिन चलते फिरते लोग जो आज यहाँ कल कही और उनके लिए कैफ़े जरुरी थी क्या? मुसाफिर कैफ़े!
हाँ, मुसाफिर कैफ़े घुमक्कड़ लोगो के लिए छत थी लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और थी|
चंदर एक सॉफ्टवेयर इंजिनियर, सपनो के शहर मुंबई में लाखों की नौकरी से भागना चाहता था, वही उसकी माँ शादी के लिए उसको हर रविवार नयी लड़की के साथ डेट फिक्स करने में जुटी थी| लेकिन चंदर अपने पहले प्यार से इतना दुखी था की शादी में उलझना नहीं चाहता था| इसी दौरान उसकी मुलाक़ात उसके ख्यालों से मिलती जुलती सुधा से हुआ| हालाँकि सुधा और उसके शादी ना करनेके विचार ही मिले थे| बाकि सुधा में शरीफ लड़की से परे सारे ऐब थे| पेशे से  वकील वो भी तलाकवाले मामले की
लेकिन 2 बार के इश्क़ के मरीज़ चंदर को फिर से सच्चा वाला प्यार हो जाता है| सुधा के साथ लिव इन भी हो जाता है लेकिन सुधा शादी के लिए तैयार नहीं होती| हालाँकि प्यार की खातिर हनीमून भी कर आती है
आखिर चंदर माँ को मन करते करते थक कर दूर जाना चाहता है
सुधा की मेडिकल रिपोर्ट में आता है की वो प्रेग्नेंट है लेकिन फिर भी वो शादी को तैयार नही होती| चिंता और सुधा की जिद से परेशान चंदर नौकरी छोड़ पहली ट्रेन से हरिद्वार फिर मसूरी पहुच जाता है| महीने की तपस्या (किताबें और आत्म मंथन) के दौरान उसकी मुलाक़ात पम्मी से होती है जो अपने सपनो के लिए 10 सैलून से जमीन तलाश रही है| पम्मी को कैफ़े के लिए रुपयों की जरुरत थी और चंदर को पम्मी के सपनो में अपना वर्षो का ख्वाब दोनों ने मिलकर कैफ़े शुरू कियामुसाफिर कैफ़े|
सुधा, जो अपने और चंदर के बच्चे को अकेले बड़ा कर रही थी जिसके लिए उसने वर्षो पहले चंदर से झूठ बोला था | और जब उसके दाखिले के लिए भारत के प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में जाती है तो उसका मन चंदरसे मिलने को होता है|
वोमुसाफिर कैफ़ेजाती है और फिर चंदर, सुधा एक हो जाते हैं| पम्मी उनकी अच्छी दोस्त से बढकर हमेशा साथ रहती है| चंदर कैफ़े में किताबों के बीच बच्चो को कहानियां सुनाता है और पम्मी कैफ़े |
समीक्षा: 

दिव्या प्रकाश दूबे जी ने मुसाफिर कैफ़े के माध्यम स उन लोगो के सपनो को एक उड़ान देने कोशिश की है | कहानी में आप मुंबई की रात, हरिद्वार में कुछ दिन और फिर मसूरी से अच्छी तरह से वाकिफ हो जायेंगे| 
कहानी महत्वाकांक्षी  “चन्दर” और बेफिक्र सुधा की है| जो अपनी ज़िंदगी को अपने तरीके से जीते है, हालाँकि इसके लिए उन्हें रहें बदलनी पड़ती है और अंत साथ हो जाते है|

कहानी बहुत ही उतार चढ़ाव के साथ बाँधे रखने में सफल रहती है| कहानी में आपको कही भी बोरियत महसूस नहीं होगी | दूबे जी की कहानी कौशल बेजोड़ है | एक बार जरूर पढ़िए!


Review: 5/5






 

The Two Intellectuals

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Ayush Sinha July 11, 2018
Once two intellectuals in a city full of scholars came across each other, and the most interesting thing was, as is many times normal among people like them, they were both lonely, dejected, confused. The first one was in search of the source of optimism and the other in search of the fountain of pessimism. 
“It seems that you are searching for something very precious, sir; and you look so dejected,” said the first one. 
“Yes, sir, it has been for a long time since I started my journey, but I still cannot see it. I am searching for the source of optimism.”
“Oh! I am really very sorry then, but, brother, there can be no such thing as optimism. Whatever is is pessimism,” ejaculated the second one; however, he was confirmed that there is no such thing as optimism.
“No, no, think of it a little more, my brother. How can you say that? I have been into it for more than a decade. It seems that you have never looked into it, but I am now here. Let me teach you about it,” said the first one, his face wreathed in confused smiles. 
No sooner had the first scholar finished saying that than he got to know that his mate, too, had been into the subject of pessimism for more than a couple of decades. It surprised him even more, and to such an extent that he coud anytime burst into the laughter of pride. They went on arguing, and, as it seemed, their argument was a never-ending one. Passers by congregated, and soon the two scholars had many entertaining themselves without any cost. 
At times the argument went on to such a turn that they even forgot what they were arguing about. At last, seeing the condition getting out of control, an old illiterate peasant decided to come forward. He had been listening to them for more than an hour. 
“Sons, what do you think light and darkness are? Are they two different things to you?” asked the old peasant, smiling naturally. 
It was the first time that they had both agreed with each other, believing that both light and darkness are two totally different things. 
“Can a crest of an ocean, my sons, be different from its trough? Are happiness and dejection two different things, then?” asked the illiterate.
The old man smiled and moved on, blessing them both. For his work was perhaps finished, leaving a trail of blissful silence. But I am sure he was grateful for being an illiterate

बनारस टाकीज, बी एच यू से अस्सी की जुबानी है

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बनारस टाकीज़, सत्य व्यास की लिखी बेहतरीन कहानी है| व्यास जी की कहानी बी एच यू के भगवान दास  हॉस्टल के दोस्तों के इर्द गिर्द घूमती है| घाटों के शहर बनारस के बीचों बीच काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हजारों छात्र की अपनी एक कहानी है| उन्ही पिटारों से सत्य व्यास ने लॉ की पढाई करने आये पांच लोगो से कहानी को सींचा| कहानी में बनारस के घाट की मस्ती है तो खुबसूरत शहर की झाकियां भी है| भाषा का अल्हड़पन है तो तंग बदनाम गलियों के पीछे की दास्ताँ भी है| भगवान दास की कहानिया है तो प्यारी सी नोक झोक भी है| पूरा बनारस समेटे हुए है बनारस टाकीज|

कहानी अनुराग डे, जयवर्धन, संजय, राम प्रताप दूबे, राजीव पांडे और शिखा की है| बनारस टाकीज का एक एक किरदार बहुत ही रोचक और अपने शैली में कहानी में बना रहता है|
अगर आपने बनारस में वक़्त बिताया है तो कहानी के डायलाग आपको लोट पोट करेगी-

“कमरा नम्बर-88 में नवेन्दु जी से भेंट कीजिये. भंसलिया का फिलिम, हमारा यही भाई एडिट किया था. जब ससुरा, इनका नाम नहीं दिया तो भाई आ गये ‘लॉ’ पढ़ने कि ‘वकील बन के केस करूँगा.’ देश के हर जिला में इनके एक मौसा जी रहते है|”


बनारस टाकीज में अच्छी कहानी के हर तत्व है; जैसे प्यार में जद्दोजेहद, तकरार, दोस्तों में रार, क्रिकेट और तो और बम ब्लास्ट भी| संजय तो पीट भी गया था| सीनियर-जूनियर के बीच लगान जैसा मैच| 
पूरी कहानी आपको अंत तक बांधे रखने में सफल रहेगी, हॉस्टल के खट्टे मीठे यादों को तारो ताज़ा करने के साथ ही बनारस के देशी अंदाज़ के एक बार जरुर पढ़े |




रिव्यु/ समीक्षा: 4/5

कहानी     ****
किरदार    ****
डायलाग    ****

क्यों पढ़े: बनारस को समझने में आसानी होगी| साथ ही खुबसूरत शहर का दीदार कहानी के माध्यम से कर सकेंगे|

ना पढने की वजह: अगर बनारस की भाषा से एतराज़ हो तो ये किताब आपके लिए बोझिल होगी|

Words Are Not Reality

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     By Ayush Sinha

The word ‘love’ is not love, nor can any of its definitions be love. The problem with our minds is that they get too attached to words, and then try to find out their meanings, to define them in a thousand ways. In this way we have thousands of ways of defining love, and millions of words, but unfortunately, don’t have its realization. 
There is that realization only when the mind no longer cares about definitions and words, seeing things as they are, saying, “I don’t know what it is about.” Take everything that is not love out of the self, and that which remains is only love. Isn’t love synonymous with understanding? There is only understanding when one has forgotten everything that one knows, because then there is no process of thinking or assuming in that state. The mind is completely silent, and in this silence is understanding, and awareness. The very definition of the word ‘awareness’ means living in the present, so that one can clearly see what is before one’s eyes, without distorting and twisting it. On the other hand, how can one be aware if one is busy thinking? All that we need to do is to see things as they are, without any kinds of efforts. 
The sun is hot, and this is truth. So truth is just truth; it has nothing to do with philosophy, spirituality, religion, or mysticism. In fact, truth is aways there, before our eyes. We just need to be in tune with that, understanding that all divisions, including those of religions, nationalities, and communities, are those of thought; and this thought has been our accumulated knowledge that is very limited. But understanding, and love, has nothing to do with that knowledge.  
Nevertheless, when we think, we always work in the realm of knowledge accumulated by us, and this knowledge is very limited, which goes together with ignorance. To know something beyond our knowledge, will we not have to put our thought aside for a while, so that we can see things as they are, without comparing, criticising, and judging them? For there is a world of difference between thinking, and understanding what is before our eyes. When there is no thought, there is no thinker, nor are there any divisions. We are what is before our eyes, and only in this state is understanding. 

#HumTum कहानी: खो गए!

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#HumTum कहानी: खो गए!

#HumTum में पहली कहानी है “खो गए!”

“सुनिए! आप वही हैं ना? फेसबुक पर हैशटैग से पोस्ट करने वाले?” उसने उतावलेपन से पूछा।
“जी, नहीं!” मैंने रूखेपन से जवाब दिया और टेबल पर पड़ी बोतलों, प्लेट्स को उठाकर डस्टबिन में फेंक दिया।
कुछ ही देर बाद, उसने मेरी तरफ इशारा करके मोबाइल में दोस्तों को कुछ दिखाया। उन्होंने हां में सर हिलाया और मुझे घूरने लगे। मैंने काउंटर से ऑर्डर रिसिप्ट उठाई और वापस किचेन में चला गया।

ये दुनिया भी कितनी छोटी है ना! कि 1000 मील दूर से भी कोई आपको अचानक से मिल जाए पता नहीं!
“वीना” को मेरी कविताएं बहुत पसंद थी, धीरे धीरे हम करीब आते गए, फिर फोन पर हमारी घंटों बातें होने लगी। 3 साल पहले मिलने के भी प्लांस बने, लेकिन अचानक से आए भूकंप में मेरा परिवार बिखर गया। परिवार में सिर्फ मै बदनसीब ही जिंदा था।

अपना शहर छोड़ मै यहां आ गया था और रेस्टोरेंट में काम करने लगा।  जब एक दिन मैसेज चेक किया तो “वीना” का आखिरी मेसेज था, “धोखेबाज हो तुम” और फिर कभी वापस फेसबुक नहीं खोला।
हां आखिरी बार उसकी कुछ तस्वीरें सेव कर ली थी, जिसे हर रात निहार लेता हूं और कुछ पंक्तियां सुना दिया करता हूं।

“स्वर! टेबल 5 का ऑर्डर हो गया” मैनेजर ने आवाज़ दी और मै सर झुकाए ऑर्डर उनके टेबल पर रख आया।
सब ख़ामोश थे, मैंने कनखियों से “वीना” की तरफ देखा वो भी मुझे ही देख रही थी, उसके आंखो में तैरते आंसू सवालों से भरे थे।

मै मुड़ा और वापिस किचेन में चला गया, उन्हीं सवालों के साथ जिसका जवाब सिर्फ अतीत के पास है।

#हमतुम
#humtum

खोये पन्ने : एपिसोड 2 मुझे प्यार है!

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खोये पन्ने का दूसरा भाग लेकर फिर हाज़िर हूँ, 


एपिसोड 2 मुझे प्यार है!


मैं मन ही मन मुस्काई, कसूर भी तो मेरा था| आधे घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद किसी तरह मैने पानी को बाहर निकाला| 
“कम्बख़त नीद पहले ही खुल जाती तो क्या गुनाह कर देती| पूरा कपड़ा गीला हो गया|” 

मैने नीद तो जमकर लताड़ा| खिड़की के बाहर अभी भी हल्की सी बारिश हो रही थी और वो लगातार अंदर आने के लिए दस्तक दे रहा था| मैने घड़ी पर एक नज़र दौड़ाई, रात के 2 बज रहे थे| नीद तो कब की उड़ चुकी थी और अब थोड़ी ठंड भी बढ़ गयी थी मैने आलस मे आकर गीले कपड़े उतार वही टेबल पर रख दिया और ठंड से राहत के लिए कॉफी को बनाने चली गयी| 

वापस कंबल से खुद को ढका और जैसे ही कॉफी का एक सिप लिया, खुशी और ताज़गी का एहसास हुआ| पिछले 8 सालों मे कॉफी से मेरा प्यार और गहरा हुआ है| कॉफी और किताब के सिवा है ही कौन? 8 साल से बस अपनी दुनिया|

मम्मी पापा, बहन 8 साल पहले एक रोड एक्सिडेंट मे दूर चले गये और फिर 1 साल अंदर दादा दादी| कुछ महीनो तक अंकल आंटी ने सम्हाला और जब मैं सदमे से बाहर आई तो खुद अलग रहने का फ़ैसला किया| सबने समझाया लेकिन मेरी ज़िद थी, खुद को बनाने की, पहचानने की और सच को स्वीकारने की|

कॉफी की एक एक सिप का मज़ा मैं आँखे बंद करके ले रही थी| अभी भी हवाओ का झोका अपने चेहरे पर महसूस कर रही थी| जैसे कोई साँसे चल रही हो| धीरे धीरे ये और भी गहरी होती जा रही थी| घबराहट मे मैं थोड़ा पीछे हुई, और अगले ही पल मुझे गर्दन पर गीलापन महसूस हुआ और …..


और फिर आगे क्या हुआ ?

 इंतज़ार कीजिये अगले भाग का!

The Endless Wait

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     By Ayush Sinha

Romesh, a twenty-four-year-old graduate, seemed to have lost all his hopes in the hue and cry of Kolkata with his newfangled B.Tech. degree. Having been rejected by more than ten companies, he now had no options other than returning to his village, Murshidabad. The village, veiled by the gloom of illiteracy, was home to some of India’s poorest people. Of course, a place where people preferred grazing cattle to books couldn’t be a paradise to a young man like him, but it was all in all; it was the heart of his own heart.

Dreams were shattered somewhere in the ravages of time, and, to him, it was now no use wandering with the college degree he had attached most of his dreams to. Day in, day out he cast his mind back to his childhood, when he was but an innocent child sleeping in his mother’s lap, where people had never scared him and things had never seemed to be as intricate as they were. He decided not to stay in the city any more and to make for his village without waiting even for a single day.
***

Bewildered, Romesh was on his way to Howrah Junction, his head laid on the side of the open window of the cab. The impressions of the city, which had once seemed indelible, were now waving him off, and parting themselves from his dejected mind by and by. But little did he know that serendipity has always had its own ways.

He received a phone call from an unknown number, but couldn’t believe his ears after accepting it. It left him in a state of complete oblivion. He was informed that one of those companies, after a second thought, had decided to give him a break, and that he had to report to the office the following day.

Clouds were gathered in the north-east corner of the grey sky, and the waning light of the sun was now exhilarating some of the deepest corners of his heart, the corners that had been gloomy for years in the debt of his dilapidated past. What a beautiful evening it appeared to be! The moment he had dreamt of for years was now no longer a dream to him. All of a sudden, the flame of his heart had begun to kindle a new sort of consciousness in it, and his whole self, in that ecstasy, seemed to be one with the world around him.

The cab was stuck in the traffic. He phoned his mother at once, and their happiness knew no bounds. One of the most beautiful moments of his life it was, but the wait for meeting each other was perhaps going to be a little longer now.

Ramesh couldn’t sit in the cab any more, paying the driver off. But no sooner had he crossed the divider of the road, while he was still busy talking to his mother on the phone, than he saw some sort of light before him all of a sudden. It grew and grew, until everything appeared blurred, and eventually, darkness was what left. People congregated around, checking if there was still some life left in him, but all that they had was the voice of the mother screaming, and waiting for her son’s voice. The wait was indeed longer. Perhaps serendipity has always had its own ways.

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