मेरी यादों से एक ख़त

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थोडा लेट हूँ, लेकिन लिखने का कोई सही वक़्त नहीं होता है| पिछले दिनों 8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया |  सैकड़ों कार्यक्रम हुए, कुछ एक महिलाएं सम्मानित भी हुयी | कुछ ने अपने मुश्किल दौर को लोगों के बीच रखा | तमाम न्यूज़ चैनल्स महिलाओं के स्वाभिमान की गाथा सुना रही थी, अख़बार महिलाओं के तरक्की की कहानियां बुने हुए थी | मुझे भी फख्र हो रहा था! लेकिन क्यों?

amit pandey letter


माँ को रसोईघर घर में काम करते हुए देख कर या फिर बहन को अपनी खुशियों(सपना) का गला घोट मेरे लिए घर के दूसरे कामों को जल्दी खत्म करते हुए देखकर? पत्नी का 2 किमी मंडी सिर्फ इसलिए जाना की कम से कम 50 रुपये बच जायेंगे और फिर मुझे कुछ ना बताना जानकर?  या फिर दादी का अपने चश्मे का कांच इसलिए ना बदलवाना कि मुझे इस बार जन्म दिन पर महँगी घडी देने की मज़बूरी पर गौर करके?

फ़िलहाल ये तो हर घर की कहानी है, कृपया इस पोस्ट पर अपने अच्छे चरित्र होने का प्रमाण मत दें| 
मेरी एक महिला मित्र है (अन्यथा ना लें) उनके विचार भी कुछ ऐसे ही हैं की “महिलाओ को क्यूँ आज भी घर की धूल फ़ाकने को मजबूर किया जा रहा है? आखिर कभी मेक अप पर तो कभी लिबास पर क्यूँ टोका जा रहा है ? आजादी के दशकों बाद भी अपने मौलिक अधिकार के लिए क्यूँ तरसाया जा रहा है?”

बहरहाल ये पोस्ट कुछ अपने बारे में बताने के लिए और उन तमाम “हयात” को तहे दिल से शुक्रिया करना चाहूँगा जिन्होंने जिंदगी के हर पहलू से मुझे रुबरु कराया | जिनका जिक्र भी कर रहा हूँ, ये तमाम वो लोग हैं जिन्होंने मेरे जिंदगी के २४ साल में रंग भरे हैं|

माँ, वैसे तो मै मम्मी ही कहता हूँ, मुझे याद नहीं इनका चेहरा पहली बार कैसा था? बचपन की कुछ यादें जरुर याद है,  धुंधली ही सही | मम्मी से मै कोई बात छिपाता नहीं हूँ, हाँ बहुत परेशान होता हूँ तो जाकर उनके गोदी में लेट जाता हूँ और माँ सरसों के तेल से सर में मालिश कर देती हैं | बहुत सुकून मिलता है हालाँकि अन्दर से फफक कर रोता हूँ लेकिन माँ के सामने दर्द को समेटे रहता हूँ अगर वो भी रो पडी तो हमें सम्हालेगा कौन! वो बार बार पूछती हैं क्या हुआ सोनू बताओ लेकिन मै मुस्करा कर ‘कुछ नहीं ‘ कहकर टाल देता हूँ | जब से डायबटीज हुआ है थोडा बीमार सी रहती हैं, कमजोर भी हो गयी हैं |

मम्मी बचपन में कहानिया सुनाती थी, फ़िलहाल अब कहती है बड़े हो गये हो, तो दुःख होता है| ज्यादा वक़्त नहीं दे पाने का मलाल भी है |

अभी 4 साल पहले का वाकया है हमारे एक दूर के रिश्तेदार की बेटी थर्ड जेंडर है (ससम्मान), स्नातक है और इस समय अध्यापक भी है | उनकी शादी तय हुयी थी (किसी तलाकसुदा से) जो होने से पहले ही टूट गयी थी| मम्मी बहुत परेशान थी| मैंने मम्मी से कहा मै शादी कर लेता हूँ | मम्मी बहुत खुश हुयी, उन्होंने बाद में बताया की वो भी यही सोच रही थी| लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी क्योकि वो उम्र में बड़ी थी और उनके परिवार की सहमति नहीं थी| अभी बीते 7 मार्च को “अंजलि”की शादी हुयी| मम्मी भी वहां गयी थी, आज ही आयी है |

amit pandey a letter to mom


एक  मज़ेदार वाकया याद आया, मेरी लिखावट बहुत खराब थी| एक दिन मम्मी पढ़ा रही और सही से लिखने को कह रही थी लेकिन मै तो अकडू कैसे सही से लिखता? आखिर मम्मी ने तंग आकर मेरे दोनों पंजो को साथ कर खूब कूटा, (ज्यादा चोट नहीं थी) और तब से मेरी लिखावट शानदार हो गयी| मुझे हिंदी के स्कूल टेस्ट में पूरे 10 अंक मिलते थे |

यूँ तो बहुत गलतियाँ की है, शायद छोटी ही हो तभी माफ़ी मिल जाती है लेकिन एक गलती जिसका पश्चाताप पूरी जिंदगी करूँगा, तब भी कम ही होगा| आज भी उसे याद करके रोना आ जाता है| मुझे गुस्सा बहुत आता था, मै और मेरा छोटा भाई (15 महीने छोटा) क्रिकेट खेल रहे थे | किसी बात पर हमारी  लड़ाई हो गयी | मम्मी ने बीच बचाव कर अलग किया, मै कुछ दूर जाकर खड़ा होकर भाई को भला बुरा कह रहा था, अचानक से किसी बात पर गुस्सा आया और मैंने बैट चला दिया, बैट कई बार लुढ़कते हुए जाकर मम्मी के घुटने से थोडा ऊपर लगा | मै बहुत डर गया था, कही भाग कर जाकर 2 घंटे तक रोया (अभी भी आँखे नम है ) पापा मुझे घर लेकर गए मैंने माफ़ी मांगी | चोट वाली जगह पर गहरा नीला निशान था | मम्मी ने कई दिनों तक बात नहीं की और उसके लिए मै अपने आप को आज तक माफ़ नहीं कर पाया हूँ| शायद ताउम्र नहीं कर पाऊंगा |

लेकिन उस घटना के बाद मेरा गुस्सा खत्म हो गया | अब तो आप जानते ही हैं !

सबसे छोटी बहन, छोटी ही कहते है सभी इसे | इसे तो मैंने गोद में खिलाया है| बचपन से आज तक मेरे लिए किसी से भी लड़ जाती है चाहे मै गलत ही क्यूँ ना हूँ| बचपन में बात बात पर लड़ती और जब गुस्सा करती तो नाम लेकर बुलाती| मुझे याद है मैंने उसे एक बार एक थप्पड़ लगाया था क्यू याद नहीं| बहुत रोई थी, कई दिनों तक नाराज़ थी तब से आज तक उसे जोर से डाट भी नहीं लगायी है हाँ कभी कभी पढाई और करियर को लेकर ज्ञान जरुर देता हूँ |

amit pandey letter to sisters


एक दिन छोटी खुले छत से आँगन में गिर गयी (11 साल पहले), मैं क्रिकेट खेल कर आ रहा था , गाँव के लोग मुझे देखते है बताये की जल्दी जाओ घर! मै भागता हुआ घर पंहुचा, पता चला की सब हॉस्पिटल गए हैं| मै बदहवास हो गया था जब तक उसे देख नहीं लिया | हालाँकि अब छोटी बड़ी हो गयी है, मम्मी का ख्याल रखना और जरूरी चीजों को ध्यान में रखती है|

छोटी से बड़ी भी है, लेकिन मुझसे छोटी ‘रोली’, बचपन में बहुत रोती थी | हालाँकि मुझसे ३ साल छोटी है लेकिन हमारी आपस में कभी नहीं बनी | 3 साल की थी तभी चाचा अपने साथ ले गये थे, इसलिए हमारा बचपन का साथ कम ही था | बड़ी बड़ी बातें लेकिन सब घर की हालत के साथ बैलेंस बनाकर चलने वाली बहना | मेरे कॉलेज प्रवास के दौरान घर के बाहर की सारी जिम्मेदारी बखूबी निभायी | एक तरह से घर में मेरी कमी महसूस नहीं होने दिया और अभी भी मुझसे ज्यादा प्यार इसे ही मिलता है | कभी कभी आर्थिक हालत पर बात होती है तो लगता है किसी समझदार से बात कर रह हूँ|

amit pandey a letter to grandma


दादी जिनकी कमी आज भी खलती है, डांट के बाद दादी प्यार करती, हाथो से खाना खिलाती, मेले में जाने के लिए रुपये देती थी| 2010 में दादी इस दुनिया से चली गयी, और सब लाड़ प्यार बस यादों में रह गया|

इनके अलावा कुछ लोग हैं जिन्होंने मुझे बचपने से निकाल असल जिंदगी से सरोकार कराया | “आर.जे. मेरी प्रथम महिला मित्र, इनसे हमें असल जिंदगी का ज्ञान मिला, और उम्र के नये पड़ाव का अनुभव भी |  “लूसी” ऑस्ट्रेलिया से (फेसबुक के जरिये) बहुत ही अच्छी मित्र आज भी है, मुझे फ्रीलान्स कैसे करना चाहिए और भी बहुत सी बारीकियों से परिचित कराया| “एच डी” बहुत ही अच्छी दोस्त, हमारी दोस्ती अच्छी थी लेकिन उन्हें सिर्फ दोस्ती मंजूर नहीं थी तो दोस्ती वही पर थम गयी | “अ दी” शायद दिखावटी और अड़ियलपन मैंने सबसे पहले इन्ही में देखा था, बहरहाल बहुत ही मजबूत और स्वाभिमानी लड़की, “के के” निहायत ही सीधी लेकिन जज्बातों को रोक ना पाने वाली लड़की | इनसे मैंने बहुत कुछ सिखा की कैसे तंगहाली में अपने आसू छिपा लेना चाहिए या फिर जब कुछ अच्छा ना हो तो जी भर के रो लेना चाहिए (किसी अपने के लिहाफ में) आपकी जिंदगी में आप अपना मुकाम हासिल करें यही दुआ है और कुछ एक लोग हैं जिनसे मैंने कुछ ना कुछ सिखा है| कुछ से इंतज़ार करना तो कुछ से ….|
कुछ फेसबुक की महिला मित्रों ने भी जिंदगी में बहुत प्यार दिया, शर्मा जी नोएडा वाली, पी के, यामिनी भोपाल से, पटेल जी, भाटिया जी और भी बहुत लोग.



और कुछ लोग जो मेहमान है, बने रहिये..

तो ये रहा मेरा छोटा सा सफ़र इसके माध्यम से मै तमाम लोगो का शुक्रिया करता हूँ मुझे जिंदगी के रंग से सरोबार करने के लिए | जिनका जिक्र ना हुआ हो, इसका मतलब ये नहीं की आप कुछ नहीं हैं लेकिन वास्तव में भूल गया हूँ लेकिन आप को भी शुक्रिया |

आप भी देखिये आप के घर परिवार में भी यही लोग है, महिलाएं है जो आपके जिंदगी के कैनवास पर रंग गुलाल से रोशनी कर रहे हैं| उन्हें प्यार, सम्मान और बराबरी का दर्जा दीजिये | वृद्धाश्रम की बूढी ‘माँ’ हो या अनाथालय की ‘गुड़िया’, रोड से गुजरती ‘शबाना’ हो या आपके घर की नौकरानी ‘सोनी’ हो या फिर मजबूर लाचार औरत आपके सामने हाथ फैलाये खड़ी हो| सब सबसे  पहले इन्सान हैं | मानवता को शर्मशार मत होने दीजिये | उनकी इज्जत कीजिये | 


Note: ये मेरे जिंदगी के अहम् घटनाओं में से है ये मेरा पहलू है| मेरे मित्र या जिनका जिक्र हुआ है उनके विचार भिन्न हो सकते हैं| एक निवेदन ये भावनाओ के साथ लिखा है, कॉपी ना करें|

“अमित” की कलम से 

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