बनारस टाकीज़, सत्य व्यास की लिखी बेहतरीन कहानी है| व्यास जी की कहानी बी एच यू के भगवान दास  हॉस्टल के दोस्तों के इर्द गिर्द घूमती है| घाटों के शहर बनारस के बीचों बीच काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हजारों छात्र की अपनी एक कहानी है| उन्ही पिटारों से सत्य व्यास ने लॉ की पढाई करने आये पांच लोगो से कहानी को सींचा| कहानी में बनारस के घाट की मस्ती है तो खुबसूरत शहर की झाकियां भी है| भाषा का अल्हड़पन है तो तंग बदनाम गलियों के पीछे की दास्ताँ भी है| भगवान दास की कहानिया है तो प्यारी सी नोक झोक भी है| पूरा बनारस समेटे हुए है बनारस टाकीज|

कहानी अनुराग डे, जयवर्धन, संजय, राम प्रताप दूबे, राजीव पांडे और शिखा की है| बनारस टाकीज का एक एक किरदार बहुत ही रोचक और अपने शैली में कहानी में बना रहता है|
अगर आपने बनारस में वक़्त बिताया है तो कहानी के डायलाग आपको लोट पोट करेगी-

“कमरा नम्बर-88 में नवेन्दु जी से भेंट कीजिये. भंसलिया का फिलिम, हमारा यही भाई एडिट किया था. जब ससुरा, इनका नाम नहीं दिया तो भाई आ गये ‘लॉ’ पढ़ने कि ‘वकील बन के केस करूँगा.’ देश के हर जिला में इनके एक मौसा जी रहते है|”


बनारस टाकीज में अच्छी कहानी के हर तत्व है; जैसे प्यार में जद्दोजेहद, तकरार, दोस्तों में रार, क्रिकेट और तो और बम ब्लास्ट भी| संजय तो पीट भी गया था| सीनियर-जूनियर के बीच लगान जैसा मैच| 
पूरी कहानी आपको अंत तक बांधे रखने में सफल रहेगी, हॉस्टल के खट्टे मीठे यादों को तारो ताज़ा करने के साथ ही बनारस के देशी अंदाज़ के एक बार जरुर पढ़े |




रिव्यु/ समीक्षा: 4/5

कहानी     ****
किरदार    ****
डायलाग    ****

क्यों पढ़े: बनारस को समझने में आसानी होगी| साथ ही खुबसूरत शहर का दीदार कहानी के माध्यम से कर सकेंगे|

ना पढने की वजह: अगर बनारस की भाषा से एतराज़ हो तो ये किताब आपके लिए बोझिल होगी|